मंगलनाथ मंदिर

स्कंधपुराण के अंवतिका खंड में इस मंदिर के जन्म से जुड़ी कथा है। कथा के अनुसार अंधाकासुर नामक दैत्य ने शिव से वरदाना पाया था कि उसकी रक्त की बूँदों से नित नए दैत्य जन्म लेते रहेंगे। इन दैत्यों के अत्याचार से त्रस्त जनता ने शिव की अराधना की। तब शिव शंभु और दैत्य अंधाकासुर के बीच घनघोर युद्ध हुआ।

ताकतवर दैत्य से लड़ते हुए शिवजी के पसीने की बूँदें धरती पर गिरीं, जिससे धरती दो भागों में फट गई और मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई। शिवजी के वारों से घायल दैत्य का सारा लहू इस नए ग्रह में मिल गया, जिससे मंगल ग्रह की भूमि लाल हो गई। दैत्य का विनाश हुआ और शिवजी ने इस नए ग्रह को पृथ्वी से अलग कर ब्रह्माण में फेंक दिया। इस दंतकथा के कारण जिन लोगों की पत्रिका में मंगल भारी होता है, वह उसे शांत करवाने के लिए इस मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। इस मंदिर में मंगल को शिव का ही स्वरूप दिया गया है।

उज्जैन में अंकपात के निकट, शिप्रा तट के टीले पर मंगलनाथ का मंदिर है। मत्स्य पुराण में लिखा है कि ‘अवन्र्त्यांच कुजाजातों मगधेच हिमाशुन:।’ तथा संकल्प में भ‍ी ‘अवन्तिदेशोतभव भो भोम’ इत्यादि अनेक प्रमाणों से मंगल की जन्मभूमि उज्जैन मानी जाती है (‘यत्रहि मंगल जनिभू: सावती मंगल स्थिते र्हेतु:’) यहाँ मंगल की उत्पत्ति हुई है। अत: सर्वदा मंगल ही होता रहता है। संभवत: कभी मंगल ग्रह की खोज यहाँ से हुई होगी, ऐसी हमारी मान्यता है। यह बड़ा रम्य स्थल है।

यहाँ मंगलवार को दिनभर पूजन होता रहता है, यात्रा भ‍ी होती हैं। वैशाख मास में ‍यात्रा भी लगती है। मंगलवार की अमावस्या को जनता यहाँ स्नान-दान कर दर्शन करती है। इसी के निकट इंदौर के सरदार किबे साहब का एक बड़ा विशाल एवं सुंदर ‘गंगा-घाट’ है। यहाँ की भात-पूजा भी बड़ा महत्व रखती हैं। स स्थान से शिप्रा का निर्मल जल और प्रकृति के मोहक दृश्य का ऐसा सुंदर-मादक चित्र नेत्र के सामने उपस्थित होता है कि एक क्षण के लिए अशांत चित्त भी शांत और प्रफुल्लित हो जाता है।

पुराणों के अनुसार उज्जैन नगरी को मंगल की जननी कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए यहाँ पूजा-पाठ करवाने आते हैं। यूँ तो देश में मंगल भगवान के कई मंदिर हैं, लेकिन उज्जैन इनका जन्मस्थान होने के कारण यहाँ की पूजा को खास महत्व दिया जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है। सिंधिया राजघराने में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया था। उज्जैन शहर को भगवान महाकाल की नगरी कहा जाता है, इसलिए यहाँ मंगलनाथ भगवान की शिवरूपी प्रतिमा का पूजन किया जाता है। हर मंगलवार के दिन इस मंदिर में श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है।
हर मंगलवार के दिन इस मंदिर में लोगों का ताँता लगा रहता है, लेकिन मार्च की अंगारक चतुर्थी के दिन का नजारा बेहद भव्य होता है। आप अपनी सुविधा अनुसार इस मंदिर में कभी भी आ सकते हैं। यहाँ हर मंगलवार को विशेष पूजा-अर्चना का दौर चलता रहता है।