कालभैरव

गोपाल मंदिर से तीन किलोमीटर दूर शिप्रा के तट के किनारे भैरवगढ़ नाम की बस्ती है। यहां एक टीले पर काल भैरव का मंदिर है। यह मंदिर चार सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। इसे राजा भद्रसेन ने बनवाया था। पुराणों में अष्टभैरव का वर्णन मिलता है। इनमें कालभैरव प्रमुख हैं। मंदिर में कालभैरव की करीब चार फुट ऊंची प्रतिमा है और जैसे भगवान शिव के मंदिर के सामने नंदी होते हैं, वैसे ही कालभैरव के सामने श्वान की प्रतिमा प्रतिष्ठित है।

कालभैरव के मंदिर के दर्शन की मेरी अभिलाषा उतनी प्रबल नहीं थी जितना यह देखने की कि भैरोनाथ किस तरह देखते-देखते शराब का सेवन करते हैं। उच्चैन के इन भैरोनाथ के बारे में विख्यात है कि ये भैरोजी अपने भक्तों से चढ़ावे के रूप में अन्य चीजों के अलावा शराब भी लेते हैं। कई मनौती मानने वाले भक्त और तांत्रिक शराब की बोतलें चढ़ावे के लिए लाते हैं। मंदिर से कुछ दूरी पर शराब बिक्री केंद्र है, जहां की ज्यादातर बिक्री भैरोनाथ के इस मंदिर की ही बदौलत होती है। कई भक्त शराब की बोतल लेकर आए थे। पुजारी ने उनसे बोतल ली और सारी शराब कटोरेनुमा एक चौड़े पात्र में उड़ेल दी। शराब से भरे उस पात्र को पुजारी ने भैरोनाथ के मुंह से लगाया और थोड़ा तिरछा कर दिया। इसके बाद मंत्रोच्चार शुरू हुए और देखते-देखते एक मिनट में उस पात्र की आधा लीटर शराब उड़न छू हो गई। चमत्कार हो गया। जो लोग यह कमाल पहले देख चुके थे वे विह्वल थे और जो पहली बार देख रहे थे वे चकित। पिछली सदी में अंग्रेज भी चकित हुए थे, पर विश्वास न कर सके। उन्होंने इसकी कड़ी छानबीन भी कराई थी, पर हाथ कुछ न लगा।